भारतीय संस्कृति में निहित अवधारणाओं से ही संभव है पर्यावरण एवं पारिस्थितिकी  संरक्षणः डा०गणेश पाठक।

बलिया। राष्ट्रीय जल विज्ञान संस्थान रूड़की में आयोजित 'जल संसाधन एवं पर्यावरण संरक्षण' पर आयोजित राष्ट्रीय संगोष्ठी में भाग लेकर बलिया आने पर डा० पाठक ने बताया कि भारतीय संस्कृति में निहित अवधारणाओं से ही पर्यावरण एवं पारिस्थितिकी का संरक्षण किया जा सकता है। उक्त संगोष्ठी में डा० पाठक द्वारा "भारतीय चिन्तन परम्परा में जल एवं पर्यावरण संरक्षण की अवधारणाएँ" नामक विषय पर शोध पत्र प्रस्तुत किया गया। साथ ही डा० अखिलेश्वर कुमार द्विवेदी के सह लेखन में मध्य गंगा घाटी खासतौर से पूर्वांचल के बलिया सहित 10 जिलों के ' भूजल' पर एवं डा० सुनील कुमार चतुर्वेदी के सह लेखन में पूर्वी उत्तर- प्रदेश के भूमिगत से जुड़े विविध पक्षों पर शोध पत्र प्रस्तुत किए गए।


       डा० पाठक ने बताया कि भारतीय चिन्तन परम्परा में पर्यावरण संरक्षण की अवधारणा अनादि काल से चली आ रही है। हमारी भारतीय संस्कृति प्राकृतिक अनुराग एवं प्रकृति स़रक्षण की चिन्तनधारा है। भारतीय चिन्तन परम्परा में प्रकृति प्रेम इस कदर रचा- बसा है कि पँरकृति से जुदा अस्तित्व की बात हम सोच भी नहीं सकते।हमारे ऋषि - मुनि जड़- चेतन सभी तत्वों की सुरक्षा एं संरक्षण के लिए विधान बनाए हैं। चूँकि अपने देश की जनता धार्मिक एवं आध्यात्मिक प्रकृति की रही है, इसीलिए प्रकृति के सभी त्वों में किसी न किसी देवी- देवता  का अंश मानकर उनकी पूजा का विधान बना दिया,ताकि उनकी सुरक्षा एवं संरक्षण हो सके और कोई उन्हें नष्ट न करे। हमारे भारतीय मनीषियों ने सम्पूर्ण प्राकृतिक शक्तियों को आराध्य माना है एवं उनके संरक्षण की अवधारणा पँरस्तुत की है। इसी अवधारणा कू आधार पर हम प्रकृति के पाँच मूलभूत तत्वों - क्षिति, जल, पावक, गगन, समीरा  के संरक्षण हेतु ही भगवान अर्थात् भ= भूमि, ग = गगन, व= वायु, अ= अग्नि एवं न= नीर के रूप में भगवान की पूजा करते हैं ताकि इन मूलभूत तत्वों को संरक्षण प्रदान किया जा सके। यही नहीं पर्यावरण एवं पारिस्थितिकी के संरक्षण हेतु ही वृक्षों पर किसी न किसी देवी- देवता का वास मान लिया गया है । साथ ही सभी हिंसक एवं अहिंसक जीव जंतुओं को सुरक्षा हेतु इसके लिए इनको सभी देवी- देवताओं का वाहन बना दिया गया ताकि इन जीव जंतुओं को भी कैई नष्ट न करे। आज पुनः समय आ गया है कि हमें भारतीय संस्कृति में निहित अवधारणा के अनुसार ही जीवन यापन करते हुए प्रकृति को बचाना होगा।
        डा० पाठक ने अपने दूसरे शोधपत्र 'मध्य गंगा घाटी में घटता भूजल विकास स्तरः समस्याएं एवं समाधान' के संदर्भ में बताया कि बलिया सहित पूर्वांचल के प्रायः सभी जिलों में भूजल की स्थिति अच्छी नहीं है। भूजल का लगातार दोहन होने एवं वर्षा में कमी तथा अनियमितता एवं वर्षा वितरण में अनियमितता के कारण भूजल निकास की तुलना में भू-जल पुनर्भरण नहीं हो पा रहा है। यही नहीं भूषण में  प्रदूषण भी तेजी से बढ़़ रहा है। बलिया में तो खासतौर से भूजल में आर्सेनिक घातक स्तर से गुजर रहा है। भूजल में फ्लोराइड एवं आयरन की मात्रा भी खतरनाक साबित हो रही है। पूरे पूर्वाचल में भूजल का अभाव होता जा रहा है, जिससे भविष्य में पेय जल आपूर्ति सहित सिंचाई की समस्या भी उत्पन्न हो सकती है। पेय जल समस्या तो अभी से संकट के दौर से गुजर रही है।


         अपने तीसरे शोधपत्र पूर्वी उत्तर प्रदेश में 'भूमिगत जल का गहराता संकटः समस्याएं एवं समाधान' के के संदर्भ में डा० पाठक ने बताया कि पूर्वी उत्तर प्रदेश में भी भूजल की स्थिति ठीक नहीं है। कई जिले डार्क जोन में चले गए हैं, जो खतरनाक स्थिति कहा जा सकता है। डा० पाठक ने बताया संगोष्ठी के पेनल डिस्कशन में मेरे द्वारा बलिया के भूजल में आर्सैनिक की समस्या पर वैज्ञानिकों के साथ विशेष चर्चा की गयी। संगोष्ठी के निष्कर्षों को जल मंत्रालय, भारत सरकार को भेजा जायेगा ताकि विचार - विमर्श के पश्चात मंत्रालय समस्याओं के निराकरण हेतु कुछ परियोजनाएं क्रियान्वित कर सके।