निर्भया मामले में फांसी की प्रक्रिया तेज कराने सुप्रीम कोर्ट पहुंची सरकार


निर्भया कांड के दोषियों की फांसी में देरी के बीच केंद्र सरकार ने बुधवार को सुप्रीम कोर्ट से मौत की सजा की प्रक्रिया को स्पष्ट व तेज करने की मांग की है। सरकार ने याचिका दाखिल करते हुए कहा है कि सजा देने की प्रक्रिया दोषी के बजाय पीड़ित के हित पर केंद्रित होनी चाहिए। साथ ही सरकार ने मांग की है कि मौत की सजा पा चुके दोषियों को दया याचिका खारिज होने के अधिकतम 14 दिन में फांसी देने का प्रावधान किया जाए।
 

इस याचिका को निर्भया केस के लिहाज से अहम माना जा रहा है। इस मामले में भी चारों दोषी डेथ वारंट जारी होने के बाद भी कानूनी तिकड़मों का इस्तेमाल कर फांसी टालने में कामयाब हो रहे हैं। पहले 22 जनवरी को फांसी होनी थी, लेकिन एक दोषी मुकेश की दया याचिका के निपटारे में देरी से सजा टल गई। अब नए डेथ वारंट में मुकेश के साथ विनय शर्मा, अक्षय कुमार सिंह और पवन की फांसी के लिए एक फरवरी की तारीख तय की गई है।  

गृह मंत्रालय ने सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता के जरिये दायर याचिका में तीन मुद्दों पर गुहार लगाते हुए 2014 के शत्रुघ्न चौहान मामले के फैसले को स्पष्ट करने की मांग की है। याचिका में इस फैसले में दिए गए निर्देशों का खारिज करने को ‘समय की जरूरत’ बताते हुए कहा गया है कि इस मामले में दोषियों के अधिकारों को ध्यान में रखते हुए दिशा-निर्देश दिए गए थे। उस फैसले में पीड़ित और पीड़ित परिवार के मानसिक आघात, यातना आदि को नजरअंदाज किया गया था। उस फैसले के पहले और कई बाद भी जघन्य अपराधी अनुच्छेद-21 (जीवन एवं स्वंत्रतता का अधिकार) के सहारे न्यायिक प्रक्रियाओं का बेजा फायदा उठा रहे हैं। पीड़ितों के हित में जरूरी है कि नृशंस, जघन्य व भयावह अपराधियों को कानून से खेलने के मौका न मिले।

दुष्कर्म को बताया है सबसे जघन्य अपराध


मंत्रालय ने याचिका में कहा है कि देश में आतंकवाद, दुष्कर्म व हत्या में मृत्युदंड का प्रावधान है। यह माना गया है कि दुष्कर्म का कृत्य न केवल आपराधिक है बल्कि देश की दंड संहिता में किसी भी सभ्य समाज के सबसे भयानक और अक्षम्य अपराध के तौर पर परिभाषित किया गया है। यह किसी महिला या समाज नहीं बल्कि मानवता के खिलाफ किया गया अपराध है। 

याचिका में यह की है मांग



  • पुनर्विचार खारिज होने पर सुधारात्मक याचिका दायर करने की समयसीमा तय हो

  • डेथ वारंट जारी होने के सात दिन के अंदर दया याचिका दायर करने की समयसीमा हो

  • राष्ट्रपति के दया याचिका खारिज करने पर सात दिन में डेथ वारंट जारी किया जाए

  • डेथ वारंट जारी होने के बाद अगले सात दिन में दोषी को फांसी दी जाए

  • एक ही केस में एक दोषी की फांसी पर अन्य दोषियों की लंबित याचिका का असर न हो

  • इस बारे में सभी राज्यों, अदालतों और जेल प्रशासन को निर्देश दिया जाए


क्या था 2014 का शत्रुघ्न चौहान मामला


शत्रुघ्न चौहान मामले के फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने दया याचिका लंबे समय तक लंबित रहने के मद्देनजर कहा था, लंबा इंतजार दोषियों के लिए मानसिक प्रताड़ना के समान है। कोर्ट ने कहा था कि डेथ वारंट जारी होने और फांसी देने के बीच कम से कम 14 दिन का अंतराल होना चाहिए।

अलग-अलग जेल मैनुअल का मुद्दा उठाया


याचिका में कहा गया है कि जहां एक ही मामले में कई दोषियों को मौत की सजा दी गई हो उनमें अक्सर दोषी एक-एक कर पुनर्विचार या सुधारात्मक याचिका दायर करते हैं। ताकि उनकी सजा टलती रहे। अलग-अलग राज्यों के जेल मैनुअल में मौत की सजा को लेकर अलग-अलग नियम हैं। कई जगह सभी दोषियों को एक साथ फांसी देने का नियम है लेकिन कुछ जेल मैनुअल में एक-एक कर फांसी पर लटकाने का प्रावधान है।