निलंबन की अवधि में किसी कर्मचारी को गुजारा भत्ता न देना अनुच्छेद 21 का हननः मद्रास हाईकोर्ट

एक निलंबित कर्मचारी को गुजारा भत्ता द‌िए जाने के अधिकार को अनुच्छेद 21 में शामिल करते हुए, मद्रास हाईकोर्ट ने कहा है कि गुजारा भत्ता न देना, मौलिक अधिकार का हनन है। मद्रास हाईकोर्ट की चीफ जस्टिस अमरेश्वर प्रताप साही और जस्टिस सुब्रमणियम प्रसाद की खंडपीठ ने जोर देकर कहा कि निलंबन की अवधि में किसी कर्मचारी या कर्मचारियों को गुजारा भत्ता देने से इनकार नहीं किया जा सकता है। 


कोर्ट ने कहा कि "गुजारा भत्ता के भुगतान का अंतर्निहित सिद्धांत एक व्यक्ति को जीवन निर्वाह की अनुमति देना है। कर्मचारी के निलंबन के वर्तमान संदर्भ में, यह ध्यान रखना होगा कि निलंबन की अवधि में किसी कर्मचारी की सेवाएं समाप्त नहीं होती हैं,


 और नियोक्ता-कर्मचारी का संबंध जारी रहता है।" मामले के तथ्य: प्रतिवादी एक प्राइमरी एग्र‌ीकल्चर कोऑपरेटिव क्रेडिट सोसाइटी के सचिव थे। उन्हें गबन के आरोप में निलंबित कर दिया गया।


 गबन का एक ‌ऑडिट में पता चला था। तमिलनाडु कोऑपरेटिव सोसायटी एक्ट, 1983 (संक्षिप्तता के लिए '1983 एक्ट') के प्रावधानों के संदर्भ में मामले की धारा 81 और 87 के तहत जांच की गई। 30 जुलाई 2016 को लगे आरोपों के कारण अपीलकर्ताओं ने 25 अगस्त 2018 को प्रतिवादी की सेवा समाप्त कर दी,


 जिसके बाद उन्होंने हाईकोर्ट की एकल पीठ के समक्ष रिट याचिका दायर की, जिसमें उन्होंने कहा कि उन्हें 30 जुलाई 2016 से 25 अगस्त 2018 के बीच की अवधि का गुजारा भत्ता का भुगतान नहीं दिया गया। एकल पीठ ने के अवनासीअप्‍पन बनाम दी मैनेजमेंट ऑफ ठेक्‍कालूर प्राइमरी एग्र‌िकल्चरल कोऑपरेटिव बैंक व अन्य के मामले पर भरोसा करते हुए उक्त अवधि के लिए गुजारा भत्ते का भुगतान करने की अनुमति दी थी।


 मद्रास हाईकोर्ट की एकल पीठ के 25 अक्टूबर 2018 के आदेश के बाद अपीलकर्ताओं ने डिवीजन बेंच के समक्ष अपील दायर की। उन्होंने फैसले को रद्द करने की मांग की। अपील में दी गई दलीलेंः अपीलकर्ताओं के लिए पेश महाधिवक्ता ने यह दलील दी थी कि अपीलार्थी को पेमेंट ऑफ सब्‍सिस्‍टेंस एलाउंस एक्ट, 1981 की धारा 2 के संदर्भ में दी गई 'कर्मचारी' की व्याख्या के दायरे से बाहर रखा गया था।


 अपीलकर्ताओं ने कहा कि एग्र‌िकल्चरल कोऑपरेटिव क्रेडिट सोसाइटी लिमिटेड की सेवा शर्तों से संबंधित विशेष उप-कानूनों के उप-नियम नंबर 31 (2) के अनुसार, प्रतिवादी/याचिकाकर्ता, जिसे, जबकि घटना घटी, उस समय सचिव बताया गया था, 'अधिकारी' की परिभाषा के तहत आता है। अपीलकर्ताओं ने यह दलील भी दी कि गुजारा भत्ते के भुगतान का न‌ियम केवल कर्मचारियों पर लागू होता है। यह प्रबंधकीय या प्रशासनिक पदों पर नियुक्त किसी भी व्यक्ति पर लागू नहीं होता। 


उन्होंने आगे कहा कि एकल न्यायाधीश के समक्ष अपनी रिट याचिका में प्रतिवादी ने गलत कहा कि G.O.Ms.55,कोऑपरेशन, फूड एंड कंज्यूमर प्रोटेक्‍शन डिपार्टमेंट, तारीख 24 मार्च 2000, के तहत राज्य सरकार द्वारा घो‌ष‌ित तमिलनाडु प्राइमरी एग्र‌ीकल्चर कोऑपरेटिव बैंक कॉमन कैडर सर्विस रेगुलेशन्स, 2000 का रेगुलेशन 29 (d)(i) गुजारा भत्ते के भुगतान से संबंधित क्षेत्र को नियंत्रित करेगा


 क्योंकि उस सरकारी आदेश की प्रयोज्यता केवल कैडर इम्‍प्लॉयी के संबंध में है, जैसा कि 2000 विनियमों के विनियमन 29 (d) (i) में परिभाषित किया गया है। प्रतिवादी के वकील ने कहा कि प्रतिवादी को संविधान के अनुच्छेद 21 के सिद्धांत के तहत गुजारा भत्ते के दायरे से बाहर नहीं रखा जा सकता है। 


कोर्ट क्या कहा- कोर्ट ने कहा कि भले ही 1981 अधिनियम के प्रावधानों ने स्पष्ट रूप से सचिव को बाहर रखा है; 1981 अधिनियम के तहत सचिव कर्मचारी की परिभाषा में नहीं आता, हालांकि गुजारा भत्ते के भुगतान को अनुच्छेद 21 के तहत अध‌िकार के रूप में गिना जाता है। 


कोर्ट ने कहाः "निर्वाह का अर्थ है जीवित रहने की व्यवस्‍था करना, विशेष रूप से सीमित संसाधनों या धन के साथ। जीने की ऐसी स्थितियों को निर्वाह कहा जाता है, जो इस तथ्य का संकेत है कि व्य‌क्ति के पास बुनियादी न्यूनतम जरूरतों के साथ जीने के लिए पर्याप्त संसाधन नहीं हैं। एक वेतनभोगी कर्मचारी के लिए जीवित रहने का यह साधन गुजारा भत्ता कहा जाता है, जो सेवा में न रहने पर तत्कालीन खर्चों के लिए अग्रिम भुगतान है।" 


अपीलकर्ताओं की ओर से एडवोकेट जनरल नर्मदा संपत ने पक्ष रखा, जबकि प्रतिवादी की ओर से अधिवक्ता जी मुर्गेंद्रन पेश हुए ।