नही है कोई खेल का मैदान,कहाँ से निकलेंगे सचिन और धोनी?

ख़ुदागंज। जैसे कि सभी पाठक अवगत होंगे कि इन दिनों मीडिया टीम नगर से जुड़े हुए मुद्दों को जनप्रतिनिधियों एवं सरकार तक पहुचाने के इरादे से जनहित में लगातार खबरे प्रशारित करने का कार्य कर रही है,हम उन्ही मुद्दों को उठा रहे है जिनकी आवश्यकता नगर में विगत कई दशकों से चली आ रही है,इस बार मुद्दे की बात में युवाओ  एवं बच्चो के आगामी भविष्य की होगी बो भी उन बच्चो की जो क्रीड़ा में रुचि रखते हैं।
नगर में आज तक कोई खेल का उचित स्थान बच्चो को नही मिल पाया है ऐसे ना जाने कितने बच्चो की प्रतिभाएं यही दम तोड़ देती है।
आज देश मे कई ऐसे खिलाड़ी है जो देश दुनिया मे मिशाल बने हुए है जैसे कि पूर्व भारतीय क्रिकेट टीम के कप्तान महेंद्र सिंह धोनी भला इस नाम को कौन भूल सकता है और उनके द्वारा 2011 विश्वकप के फाइनल में पड़ोसी देश श्रीलंका टीम के खिलाफ लगाया गया बो गगन चुम्भी छक्का और बल्ला घुमाते हुए दर्शकों का अभिवादन आकर्षक मुश्कान के साथ छक्का लगने के साथ ही  हम सवा सौ करोड़ भारतीय खुशी में सरावोर हो जाना।
आपको पता है हमे माही कैसे मिले हम बताते है बिस्तार से माही एक साधारण से रांची के परिवार में जन्मे थे पढ़ाई लिखाई में औषत माही को रेलवे में नौकरी भी मिल गयी लेकिन नौकरी में भी उनका जुनून खेल (क्रिकेट) के प्रति ही वना रहा, उनका सलेक्शन रणजी में हो गया इसकी जानकारी उनके करीबी ने उन्हें दी लेकिन MSD असमंजस में थे कि नौकरी करे या क्रिकेट खेले,फिर अपने अंदाज के राजा कहे जाने बाले माहीं ने ठीक बैसे ही कठिन मौकों पर कई बार टीम को जीत दिलाने बाले अंदाज में कूल माही ने क्रिकेट को चुना और निकल पड़े सफलता के सफर पे,सभी अपने और परायो को गलत साबित कर दिया उस लंबे बाल बाले लड़के ने और विश्व क्रिकेट पर राज किया,उनकी उस 2011 विश्वकप टीम में एक और खिलाड़ी था जो मिशाल देने के लिए बना है हम बात कर रहे है पूर्व तेज़ गेंदबाज मुनाफ पटेल की जिन्होंने सेमीफाइनल में पाकिस्तान के खिलाफ दो महत्वपूर्ण मौकों पर दो विकेट झटके थे,जी हां बहुत कम लोग ही जानते होंगे कि मुनाफ पटेल बेहद गरीब घर से आते है और जब वह गाव में क्रिकेट खेलते थे तो उनके पैरों जूते तो छोड़िए चप्पल भी नही होती थी लेकिन बो क्या है प्रतिभा को अगर प्लेटफॉर्म मिल जाए तो वह मंजिल तक पहुचती जरूरी है।
ऐसे ही नगर एवं ग्रामीण आबादी से भरा यह ख़ुदागंज नगर एक खेल के मैदान को न जाने कब से  तरस रहा है जिसमे ना जाने कितनी ऐसी प्रतिभाए जन्म लेती है और यही थम जाती है जिसका मुख्य कारण है कि कोई उचित खेल का मैदान न होना।



जैसे खेतो में गेहूं या धान की फसल कटती है तो बच्चो के खेलने का मैदान बही खेत बन जाते है जिससे बच्चो एवं युवाओ के चहेरों पर मायूसी देखने को मिलती है। अब देखना यह है कि सूबे के मुखिया योगी आदित्यनाथ  जी का कोई जनप्रतिनिधि या कोई प्रशासनिक अधिकारी नगर की इस समस्या की ओर ध्यान केंद्रित करेगा भी या नही?


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